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व्यायाम

  • Writer: divipawar94
    divipawar94
  • May 16, 2021
  • 2 min read

लाघवं कर्मसामर्थ्य दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः ।

विभक्तघनगात्रत्वंण्यायामादुपजायते।।


व्यायाम करने से शरीर में लघुता, कार्य करने का सामर्थ्य, अग्नि की दीप्ति, बढ़ते हैं, और मेदावृद्धि का क्षय होता है। शरीर के सभी अंग मजबूत होते हैं। मतलब पसीना जब आती है, सांस में जब वृद्धि होती है, शरीर के अंगों में लघुता जब आता है, हृदय प्रदेश में बाधा उत्पन्न होती है, हृदय गति में तथा सांस की गति में वृद्धि हो जाती है, तो ऐसी स्थिति को व्यायाम कहते हैं। व्यायाम अनेक प्रकार के होते हैं। जैसे-दण्ड, कसरत, दौड़ना, तैरना, कुश्ती आदि। शरीर के विभिन्न अंगों में ताकत प्रदान करने के लिये भिन्न-भिन्न व्यायामों का निर्देश सभी शास्त्रों में किया गया है। शास्त्रों में आसनों का विधान एवं सूर्य नमस्कार का विशेष विधान है।


वातपित्तामयी बालो वृद्धीऽजीर्णी च तं त्यजेत् |


वात और पित्त के विकारों से पीड़ित रोगी, बालक, वृद्ध और अजीर्ण के रोगियों को व्यायाम नहीं करना चाहिए।व्यायाम से वात एवं पित्त की स्वभावतः वृद्धि होती है। मतलब यदि किसी को वातजन्य या पित्त जन्य रोग हों तो व्यायाम करने से और अधिक बढ़ जायेंगे। बाल्य अवस्था में सभी धातुओं की वृद्धि के लिये कफ की जरूरत होती है। यदि कोई बालक व्यायाम करता है तो कफ में कमी आती है। इससे बालक के शरीर में धातुओं की कमी आ सकती है। इसलिये 10 वर्ष की आयु तक बालकों-बालिकाओं को व्यायाम नहीं करना चाहिए। क्योंकि 10 वर्ष की उम्र तक बाल्यकाल रहता है। वृद्धावस्था में शरीर में वायु की वृद्धि होती है। यदि वृद्धा अवस्था में व्यायाम किया जाये तो वायु में और अधिक वृद्धि होगी तो शरीर में वात की बीमारियाँ और अधिक बढ़ सकती है। इससे शरीर में और अधिक कमजोरी आ सकती है। इसलिये वृद्धावस्था में व्यायाम नहीं करना चाहिए। इसी तरह अजीर्ण के रोगी को भी व्यायाम नहीं करना चाहिए। क्योंकि अजीर्ण के रोगी को भोजन का पाचन होने के लिये जल एवं कफ की जरूरत होती है। व्यायाम करने से शरीर को कफ कम होता है और शरीर में क्षोभ पैदा होता है। इस कारण अन्न यथास्थान स्थित नहीं रहता है। इस स्थिति में व्यायाम करना ठीक नहीं है।


अर्धशक्तया निषेव्यस्तु बलिमि स्निग्धभोजिभिः शीतकाले वसन्ते च मन्दमेव ततोऽन्यदा।

तं कृत्वाऽनुसुखं देहं मर्दयेच्च समन्ततः।।


स्निग्ध घी, दूध आदि का अधिक सेवन करते हुये व्यायाम करने वाले को शीतकाल में तथा वसन्तकाल में अपनी शक्ति का आधा व्यायाम ही करना चाहिए। या फिर बहुत कम व्यायाम करना चाहिए। व्यायाम के बाद सुखपूर्वक शरीर की मालिश करनी चाहिए।मतलब यदि समुचित दूध और घी नहीं मिले तो व्यायाम नहीं करना चाहिए। कारण यह है कि व्यायाम करने पर शरीर का स्नेहित कफ शरीर के काम आता है। यदि दूध-घी का सेवन करते हुये व्यायाम किया जाय तो शरीर को ऊर्जा मिलती रहती है। शीतकाल, शरद, हेमन्त, शिशिर तथा बसन्त ऋतु में व्यायाम शक्ति के अनुसार करना चाहिए। ग्रीष्म तथा वर्षा ऋतु में वायु का संचय और वर्षा ऋतु में वायु का प्रकोप शरीर में होता है। व्यायाम करने से वायु का संचय और प्रकोप दोनों ही बढ़ते हैं। व्यायाम करते हुये जब सांस की गति बढ़ जाये, हाथों में पसीना आने लगे, माथेपर पसीना आने लगे तो व्यायाम बन्द कर देना चाहिए।



Dr. Divya Prakash Pawar

BAMS, MS (Gynaecology And Obstetrics)

DYT (Diploma In Yoga Teacher)

[योग शिक्षिका]

PGDEMS (Post Graduate Diploma in Emergency Medical Services)

DDN (Diploma In Diet And Nutrition)

MDPK (Master Diploma In Panchakarma)

 
 
 

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